नफ्स से लड़ना सबसे बड़ा जेहाद, दिल की पाकीजगी के बिना रूहानी तरक्की मुमकिन नहीं : मुफ्ती फुजैल

मदरसा काशिफुल उलूम में दो दिवसीय ‘मजलिस-ए-जिक्र व सुलूक’ का आयोजन; इस्लाह-ए-नफ्स, जिक्र और शरीयत पर अमल का दिया पैगाम

उदगीर -अब्दुल वाहिद काकर
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इंसान के लिए सबसे बड़ी जंग अपने नफ्स, ख्वाहिशों और अंदर की बुराइयों से लड़ना है। जब तक इंसान अपने नफ्स पर काबू पाना, दिल को बुराइयों से पाक करना और अल्लाह की याद से अपने बातिन को रोशन करना नहीं सीखता, तब तक उसकी रूहानी तरक्की मुमकिन नहीं है। नफ्स से मुकाबला करना ही जेहाद-ए-अकबर है। यह बात आलिम-ए-दीन मुफ्ती फुजैल ने मदरसा काशिफुल उलूम में आयोजित दो दिवसीय ‘मजलिस-ए-जिक्र व सुलूक’ की पहली मजलिस को खिताब करते हुए कही।कुतब-ए-दक्कन हजरत मौलाना अब्दुल गफूर कुरैशी के जानशीन हजरत मौलाना नूरुल हक की सरपरस्ती और हाफिज फुरकान की निगरानी में आयोजित इस मजलिस में बड़ी तादाद में सालिकीन, मदरसे के तलबा और अकीदतमंद शामिल हुए। मजलिस में इस्लाह-ए-नफ्स, तजकिया-ए-रूह, जिक्र और शरीयत व सुन्नत पर अमल की अहमियत पर विस्तार से रोशनी डाली गई।

मुफ्ती फुजैल ने कहा कि हर इंसान को सबसे पहले अपनी इस्लाह की फिक्र करनी चाहिए। अपने अंदर की कमियों को पहचानना और उन्हें दूर करने के लिए लगातार कोशिश करना जरूरी है। अल्लाह और उसके रसूल के अहकाम पर अमल करते हुए अपनी जिंदगी को शरीयत और सुन्नत के मुताबिक ढालना ही सुलूक का असल मकसद है। इसके लिए नफ्स की ख्वाहिशों पर काबू पाना और गलत आदतों से दूरी बनाना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि इस्लाह और मुजाहिदा कुछ दिनों का अमल नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी का सफर है। इंसान को कभी यह नहीं समझना चाहिए कि अब उसकी इस्लाह पूरी हो चुकी है। हजरत इमाम अहमद बिन हंबल सहित बुजुर्गों के जीवन के उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि बड़े-बड़े बुजुर्गों ने भी जिंदगी के आखिरी वक्त तक इबादत, मेहनत और अपनी इस्लाह का सिलसिला जारी रखा।

जिक्र से रोशन करें दिल और बातिन

मुफ्ती फुजैल ने तकब्बुर (घमंड), हसद (जलन), हुब्बे-जाह (पद और प्रतिष्ठा की चाह) तथा गीबत (पीठ पीछे बुराई) को दिल की बड़ी बीमारियां बताया। उन्होंने कहा कि जिस तरह शरीर की बीमारी का इलाज जरूरी है, उसी तरह दिल और नफ्स की बुराइयों का इलाज भी जरूरी है। इसके लिए नेक लोगों की सोहबत, मुजाहिदा और लगातार जिक्र का सहारा लेना चाहिए। हसद इंसान की नेकियों को इस तरह खत्म कर देता है, जैसे आग सूखी लकड़ी को जला देती है।

उन्होंने रूह के तजकिये पर जोर देते हुए कहा कि इंसान को अपनी नाजायज ख्वाहिशों को मिटाकर अल्लाह की रजा को अपनी जिंदगी का मकसद बनाना चाहिए। जिक्र के जरिए दिल और बातिन को मुनव्वर करना तथा अल्लाह की मोहब्बत से अपने अंदर की बुराइयों को दूर करना ही रूहानी सफर की बुनियाद है।

उन्होंने कहा कि शैतान के बहकावे से बचने के लिए इंसान को आखिरी सांस तक अपनी इस्लाह, इबादत और शरीयत व सुन्नत पर अमल की कोशिश जारी रखनी चाहिए।

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